वक्त के बदलाव-----
चल रहा है दौर अब
बदलाव के।
चर्चे हर जबान पर
कागज की नाव के।।
बैमौसम ही नाचने लगे है मौर
उठ रहे है भीड भाड के शोर।।
बदल रही है पृकृति ।
बदल रही है इंसानी मनोवृत्ति ।।
करें चिंतन-मनन ।
कब तक होते रहें,हक अधिकारों के हनन।।
नहीं रहें अब और उलझे उलझें
करें आत्म मंथन ।
मिल रहे है बदलाव के
बडे सॅकेत ।।
तलाशें नये विकल्प
बनाये योजनाऐ फलदायी।
उभर रहे हैं वक्त के साथ नये चहरे
आ रही है प्रगति विचारों में
गुजर रहा है काल ये संक्रमण का।।
रहना नहिं यहां कोई
सदा के लिऐ ।
कभी हारा,कभी रहा विजेता
कोन यहां कब तक रहता।
रहा जो कमझोर अब तक
उभर रहा, निखर भी रहा।।
जो था अब तक पीछे
निकल रहा अब आगे
जो भी जागे।।
हे सॅकट जो आज और अभी
नही रहेगा कल।
मत कर कपट छल,
अपनी आदत बदल।।
मत रख द्वेष राग।
मत लगा बाग में आग।।
हे सॅकेत बदलाव के
बदल जाने के ।
पथझड के बाद,
फिर से नये पत्ते आने के। ।
स्वतंत्र लेखक
मदन सालवी ओजस्वी
भारतिय मिशन मीडिया भारत
95888-32673

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